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    Home»विदेश»जम्मू में ‘बर्मा कॉलोनी’ की स्थापना और रोहिंग्याओं का असर, CJI की चेतावनी हुई सच
    विदेश

    जम्मू में ‘बर्मा कॉलोनी’ की स्थापना और रोहिंग्याओं का असर, CJI की चेतावनी हुई सच

    AdminBy AdminDecember 11, 2025No Comments3 Mins Read
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    जम्मू में ‘बर्मा कॉलोनी’ की स्थापना और रोहिंग्याओं का असर, CJI की चेतावनी हुई सच
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    श्रीनगर 

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कड़ी टिप्‍पणी करते हुए कहा था कि भारत में घुसपैठियों के लिए किसी तरह का ‘रेड कार्पेट वेलकम’ नहीं होना चाहिए.” यह टिप्पणी भारत की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के प्रति उसके सख्त रुख को दर्शाती है. लेकिन, जम्मू की जमीन पर तस्वीर कुछ और ही बयां कर रही है. म्यांमार से आए रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के लोग न सिर्फ यहा आकर बसे हैं बल्कि अब कई इलाकों में उनकी स्थायी बसावट, कारोबार और यहां तक कि समानांतर ढांचे तक बनते दिखाई दे रहे हैं. यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट के संदेश और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई पैदा करती है. 

    कासिम नगर बना बर्मा बस्ती
    पहले रोहिंग्या समुदाय के लोग जम्मू शहर और आसपास के इलाकों में अस्थायी कैम्पों तक सीमित थे. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. कई क्षेत्रों में इनकी परमानेंट बस्तियां बस गई हैं. झुग्गियों का विस्तार हुआ है और यहां तक कि छोटी-छोटी दुकानें व बाजार भी खड़े हो चुके हैं. ये अब सिर्फ अस्थायी रूप से रहने के मकसद से नहीं आए हैं बल्कि उनका इरादा यहीं बस जाने का लगता है. सरकारी और सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, जम्मू के नरवाल, सुंजवां, भठिंडी और अन्य इलाकों में रोहिंग्या परिवारों ने ढांचों का स्थायी रूप लेती बस्तियां खड़ी कर ली हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1994 में दो बच्चों समेत एक रोहिंग्या परिवार जम्मू पहुंचा था. इसके बाद 2009 के बाद इनकी उपस्थिति में तेज उछाल आया. 2007 से 2015 के बीच बड़ी संख्या में रोहिंग्या भारत आए और जम्मू में बसने लगे.

    पहले इस जगह का नाम कासिम नगर हुआ करता था. 2007 में इसे रोहिंग्या बस्ती के नाम से जाना जाने लगा. 2020 के बाद रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय ने अपने संगठन को इतना मजबूत कर लिया कि स्थायी रूप से बसने की चाह में इस जगह को ‘बर्मा बस्ती’ का नाम भी दे दिया गया है. यह नामकरण अपने आप में उनकी बढ़ती पकड़ और स्थायी पहचान की तलाश को दर्शाता है.

    टीचर तक बन गए रोहिंग्या घुसपैठी
    रोहिंग्या समुदाय अब सिर्फ़ रहने तक सीमित नहीं है. आधिकारिक रिपोर्टों के मुताबिक, रोहिंग्या परिवारों के बच्चे स्थानीय स्कूलों में दाख़िल हैं. कुछ संस्थानों में रोहिंग्या मूल का शिक्षक सादिक बच्चों को पढ़ाने तक पहुंचाहुआ है. यही नहीं, रोहिंग्या बच्चों के लिए अलग से मदरसे भी चल रहे हैं. इन मदरसों के संचालन पर सुरक्षा एजेंसियां समय-समय पर निगरानी बढ़ाती रही हैं. यह उनके समुदाय के भीतर एक समानांतर ढाँचा विकसित होने का संकेत है. आर्थिक मोर्चे पर भी ये सक्रिय हो रहे हैं. कुछ लोग कबाड़ इकट्ठा करने, मजदूरी और रेहड़ी-फड़ी का काम करते हैं. वहीं, कुछ छोटी-बड़ी कपड़ों की दुकानों से कमाई करते नज़र आ रहे हैं. यह सब उनकी अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप से यहीं बसने की मंशा को दर्शाता है.

    जनसांख्यिकीय बदलाव की चिंता
    पिछले कुछ सालों में इनकी आबादी में लगातार वृद्धि देखी गई है. इसने क्षेत्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय बदलावों पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार पहचान सत्यापन अभियान चलाए हैं. इन अभियानों में दस्तावेजों की कमी, संदेहास्पद पहचान और अवैध बसावट के मामले सामने आए. 2021 में महिलाएं और बच्चे सहित कई रोहिंग्या हिरासत में लिए गए थे. जम्मू में रोहिंग्या की बढ़ती और अब लगभग स्थायी होती मौजूदगी, सुरक्षा, कानून और स्थानीय प्रशासन के सामने एक गंभीर चुनौती बन चुकी है. संवेदनशील बॉर्डर जोन में ऐसी बिना अनुमति और बिना दस्तावेज वाली बसावट को जारी रहने दिया जा सकता है या नहीं, यह सबसे बड़ा सवाल है. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश और जमीनी हालात के बीच का यह विरोधाभास राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता का विषय है.

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