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    भारत ने विकसित किया ब्रह्मास्त्र, 5th जेन जेट और हाई-टेक डिवाइस बनाने की तैयारी तेज

    AdminBy AdminDecember 20, 2025No Comments8 Mins Read
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    भारत ने विकसित किया ब्रह्मास्त्र, 5th जेन जेट और हाई-टेक डिवाइस बनाने की तैयारी तेज
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    नई दिल्ली

    चीन जिसके दम पर दुनिया पर राज करना चाहता है और जिसपर उसकी सुपरमेसी है, अब उसका अंत होने वाला है. भारत के हाथ ऐसा ‘ब्रह्मास्‍त्र’ लगा है, जिससे ड्रैगन की मनमानी पर नकेल कसना आसान हो जाएगा. आंध्र प्रदेश की 974 किलोमीटर लंबी कोस्‍ट लाइन में रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स का विशाल रिजर्व मिला है. एक्‍सपर्ट का कहना है कि आंध्र प्रदेश के समुद्री तटों पर जो रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स मिले हैं, वे हाई-क्‍वालिटी के हैं. रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स के बिना फाइटर जेट, स्‍मार्टफोन, मिसाइल, इलेक्ट्रिक व्‍हीकल आदि को बना पाना असंभव है. चीन का मौजूदा रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स के 85 फीसद पर कब्‍जा है. अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर को लेकर चीन ने इसके एक्‍सपोर्ट पर नकेल कस दी थी. ऐसे में भारत जैसे देशों में हाई क्‍वालिटी प्रोडक्‍ट्स के डेवलपमेंट पर बुरा असर पड़ा. मौजूदा हालात को देखते हुए भारत ने इस सेक्‍टर में आत्‍मनिर्भर बनने का फैसला किया है. इसके बाद से ही रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स का पता लगाने के साथ ही उसके प्रोसेसिंग पर फोकस बढ़ गया है. आंध्र तट पर मिले भंडार का इस्‍तेमाल करने पर भारत 5th जेनरेशन फाइटर जेट के साथ ही iPhone जैसे कटिंग एज डिवाइस अपने दम पर बना सकेगा. साथ ही एक्‍सपोर्ट से बड़ी मात्रा में राजस्‍व भी अर्जित किया जा सकता है.

    आंध्र प्रदेश की 974 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा सिर्फ खूबसूरत समुद्र तटों और मछली पकड़ने के बंदरगाहों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि इसके नीचे छिपी रेत भारत के भविष्य के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है. श्रीकाकुलम से लेकर नेल्लोर तक फैले समुद्री किनारों की भारी और गहरी रेत में रेयर अर्थ मिनरल्स (दुर्लभ खनिज) का विशाल भंडार मौजूद है, जो ग्रीन एनर्जी, डिफेंस और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भारत की जरूरतें पूरी कर सकता है. समुद्री रेत में मोनाजाइट नामक खनिज बड़ी मात्रा में पाया जाता है. मोनाजाइट रेयर अर्थ एलिमेंट्स और थोरियम का प्रमुख स्रोत है. इसके अलावा इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन, गार्नेट और सिलिमेनाइट जैसे मूल्यवान खनिज भी यहां मौजूद हैं. खास बात यह है कि आंध्र प्रदेश के तट से निकलने वाले मोनाजाइट में 55 से 60 प्रतिशत तक रेयर अर्थ ऑक्साइड पाया जाता है, जो वैश्विक स्तर पर हाई क्‍वालिटी का माना जाता है. इसमें 8 से 10 प्रतिशत थोरियम भी होता है, जिसे भारत के भविष्य के परमाणु रिएक्टरों के लिए संभावित ईंधन माना जा रहा है.

    रेयर अर्थ मिनरल्‍स का कहां-कहां इस्‍तेमाल?

        फाइटर जेट
        इलेक्ट्रिक व्‍हीकल
        मिसाइल
        स्‍मार्टफोन
        टेलीविजन
        पेंट
        मेडिकल इक्विपमेंट्स

    कहां-कहां मिले हैं रेयर अर्थ मिनरल्‍स?

    इन खनिजों में लैंथेनम, सेरियम, नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, समेरियम और यूरोपियम जैसे हल्के रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल हैं. ये तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों के स्थायी मैग्नेट, पवन ऊर्जा टरबाइन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, उपग्रह तकनीक, फाइबर ऑप्टिक्स और मॉडर्न मेडिकल इक्विपमेंट में अहम भूमिका निभाते हैं. जीयोलॉजिकल सर्वेक्षणों के अनुसार, आंध्र प्रदेश के तट पर भीमुनिपट्टनम, कलिंगपट्टनम, काकीनाडा, नरसापुर, मछलीपट्टनम, चिराला, वोडारेवु, रामयापट्टनम और दुगराजपट्टनम जैसे क्षेत्रों में लगातार खनिज बेल्ट फैली हुई है.  रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत में कुल 30 करोड़ टन से अधिक भारी खनिज रेत भंडार है, जिसमें 1.2 से 1.5 करोड़ टन मोनाजाइट शामिल है. इसमें से 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा अकेले आंध्र प्रदेश में होने का अनुमान है. लंबे समय तक ये समुद्री तट परमाणु नियमों, सीमित प्रोसेसिंग क्षमता और नीतिगत अड़चनों के कारण पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाए. लेकिन अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में तनाव बढ़ने और चीन पर निर्भरता कम करने की जरूरत के चलते आंध्र प्रदेश रणनीतिक रूप से केंद्र में आ गया है. फिलहाल चीन दुनिया की लगभग 85 प्रतिशत रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता को नियंत्रित करता है.

    रेयर अर्थ मिनरल्‍स क्‍या होते हैं?
    रेयर अर्थ मिनरल्‍स कुल 17 तत्‍वों का समूह है, जिनमें नियोडिमियम, लैंथेनम, सेरियम, डिस्‍प्रोसियम और यट्रियम जैसे तत्‍व शामिल हैं. ये नाम से भले ही रेयर लगते हों, लेकिन ये धरती पर मिलते तो हैं, पर बहुत कम मात्रा में और अलग-अलग जगह बिखरे होते हैं. इन्‍हें निकालना और शुद्ध करना मुश्किल और महंगा होता है.

    रेयर अर्थ मिनरल्‍स को इतना अहम क्‍यों माना जा रहा है?
    क्‍योंकि आधुनिक तकनीक इन पर टिकी है. मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन चक्‍की, सोलर पैनल, मिसाइल, रडार और सेमीकंडक्‍टर चिप्‍स तक में रेयर अर्थ मिनरल्‍स का इस्‍तेमाल होता है. बिना इनके आज की हाई-टेक दुनिया की कल्‍पना करना मुश्किल है.

    क्‍या आम आदमी की जिंदगी में भी इनका असर है?
    बिलकुल…आपके हाथ में मौजूद स्‍मार्टफोन का स्‍पीकर, हेडफोन के मैग्‍नेट, टीवी की स्‍क्रीन, एसी और फ्रिज जैसे घरेलू उपकरण- इन सबमें रेयर अर्थ मिनरल्‍स इस्‍तेमाल होते हैं. यानी ये सीधे-सीधे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं.

    ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों में इनकी क्‍या भूमिका है?
    हरित ऊर्जा के लक्ष्‍य पूरे करने में रेयर अर्थ मिनरल्‍स बेहद जरूरी हैं. पवन चक्‍कियों में लगने वाले ताकतवर मैग्‍नेट और इलेक्ट्रिक कारों की मोटर में नियोडिमियम और डिस्‍प्रोसियम जैसे तत्‍व लगते हैं. अगर इनकी सप्‍लाई बाधित होती है, तो ग्रीन एनर्जी और ईवी सेक्‍टर पर सीधा असर पड़ता है.

    रक्षा और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए ये कितने अहम हैं?
    रक्षा उपकरणों में रेयर अर्थ मिनरल्‍स की अहम भूमिका है. मिसाइल गाइडेंस सिस्‍टम, जेट इंजन, रडार और कम्‍युनिकेशन उपकरणों में इनका उपयोग होता है. यही वजह है कि कई देश इन्‍हें रणनीतिक खनिज मानते हैं और इनकी सप्‍लाई को राष्‍ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं.

    दुनिया में इनका सबसे बड़ा उत्‍पादक कौन है?
    फिलहाल चीन रेयर अर्थ मिनरल्‍स का सबसे बड़ा उत्‍पादक और प्रोसेसर है. वैश्विक सप्‍लाई का बड़ा हिस्‍सा चीन के हाथ में है. इसी कारण अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत जैसे देश वैकल्पिक स्रोत खोजने और घरेलू उत्‍पादन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं.

    भारत के लिए रेयर अर्थ मिनरल्‍स क्‍यों अहम हैं?
    भारत साफ ऊर्जा, सेमीकंडक्‍टर और रक्षा उत्‍पादन में आत्‍मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए रेयर अर्थ मिनरल्‍स जरूरी हैं. देश की लंबी समुद्री तटरेखा और कुछ राज्‍यों में इनके भंडार मौजूद हैं, जिनका सही उपयोग भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बना सकता है.
    आंध्र प्रदेश ने क्‍या उठाया कदम?

    इस अवसर को पहचानते हुए आंध्र प्रदेश मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (APMDC) ने खनन और राजस्व सृजन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए हैं. केंद्र सरकार ने APMDC को 16 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बीच सैंड माइनिंग की लीज दी है. इनमें से 1,000 हेक्टेयर क्षेत्र के लिए संचालन की मंजूरी मिल चुकी है, जिसे खुली निविदा के जरिए निजी कंपनी को दिया गया है. राज्य सरकार अब अतिरिक्त 4,000 हेक्टेयर क्षेत्र खोलने की अनुमति मांग रही है, जिसके बाद बाकी 11,000 हेक्टेयर में भी तेज़ी से काम शुरू करने की योजना है. APMDC का फोकस सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर ही मूल्यवर्धन यानी वैल्यू एडिशन पर है. APMDC के प्रबंध निदेशक प्रवीण कुमार के अनुसार, कच्चा खनिज निर्यात करने से देश को तैयार उत्पाद महंगे दामों पर आयात करने पड़ते हैं. ऐसे में घरेलू प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग बेहद जरूरी है. केंद्र सरकार की उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है.
    फंडिंग का क्‍या है प्रावधान?

    फिलहाल मोनाजाइट की प्रोसेसिंग का काम केवल इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड (IREL) के पास है, जो एक केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम है. निजी कंपनियां अन्य खनिजों का खनन कर सकती हैं, लेकिन मोनाजाइट को अलग करके IREL को सौंपना होता है. क्षमता बढ़ाने के लिए IREL ने नेल्लोर के गुडूर में 10 हजार टन प्रति वर्ष क्षमता वाला मोनाजाइट प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की योजना बनाई है, जो 2026 तक चालू होने की उम्मीद है. केंद्र सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत एक और अहम कदम उठाया है. इसके तहत खनन अपशिष्ट, रेड मड, फ्लाई ऐश और औद्योगिक कचरे से महत्वपूर्ण खनिजों की रिकवरी के लिए पायलट प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी जा रही है. इसके लिए 100 करोड़ रुपये तक की फंडिंग का प्रावधान है. इससे आंध्र प्रदेश को खास फायदा हो सकता है, क्योंकि यहां वर्षों से जमा टेलिंग्स में भी रेयर अर्थ तत्व मौजूद हैं.
    इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर क‍ितना मजबूत?

    आंध्र प्रदेश में पहले से कुछ इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर मौजूद है. अनंतपुर में एक निजी रेयर अर्थ प्रोसेसिंग प्लांट काम कर रहा है और विशाखापत्तनम में IREL का बीच सैंड सेपरेशन प्लांट है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि सिर्फ दोबारा प्रोसेसिंग से ही सालाना 5,000 करोड़ रुपये का अवसर पैदा हो सकता है. राज्य सरकार ने नेल्लोर और कृष्णपट्टनम के थर्मल पावर प्लांट्स की फ्लाई ऐश से रेयर अर्थ निकालने के प्रस्ताव भी तैयार किए हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक से 80 प्रतिशत तक रेयर अर्थ रिकवरी संभव है. विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन योजनाओं को तेजी से लागू किया गया, तो अगले पांच वर्षों में भारत की रेयर अर्थ आयात पर निर्भरता 95 प्रतिशत से घटकर 50 प्रतिशत तक आ सकती है. 2030 तक वैश्विक मांग में कई गुना वृद्धि की संभावना है. ऐसे में आंध्र प्रदेश भारत की स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और उन्नत तकनीक की यात्रा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है.

     

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