माले
मॉरीशस सरकार ने एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कड़ा फैसला चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर मालदीव के बदले हुए रुख के बाद लिया गया है। बता दें कि ये दोनों ही देश भारत के मित्र हैं।
विवाद का मुख्य कारण क्या है?
मॉरीशस के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, मालदीव सरकार ने हाल ही में चागोस द्वीप समूह को लेकर अपना रुख बदल लिया है। मालदीव अब चागोस द्वीप समूह और उसकी क्षेत्रीय अखंडता पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता नहीं देता है। इसके अलावा, मालदीव ने मॉरीशस और यूनाइटेड किंगडम (UK) के बीच चागोस द्वीप को लेकर हुए हालिया समझौते पर भी आपत्ति जतानी शुरू कर दी है। इसी वजह से मॉरीशस की कैबिनेट ने मालदीव के साथ रिश्ते तोड़ने का यह सख्त कदम उठाया है और मालदीव सरकार को इसकी आधिकारिक सूचना दे दी गई है।
मॉरीशस सरकार का आधिकारिक रुख
मॉरीशस के विदेश मंत्रालय ने कहा- आज का निर्णय मॉरीशस के राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर, अंतर्राष्ट्रीय कानून और क्षेत्र में शांति और स्थिरता के सिद्धांतों को बनाए रखने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मालदीव के साथ रिश्ते तोड़ने के अलावा, मॉरीशस की कैबिनेट ने चागोस और डिएगो गार्सिया से जुड़े कुछ अन्य अहम कानूनी और कूटनीतिक घटनाक्रमों पर भी चर्चा की।
यह कूटनीतिक संकट 5 फरवरी को मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू के ‘स्टेट ऑफ द नेशन’ संबोधन के बाद गहराया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि चागोस द्वीपसमूह पर मालदीव का किसी भी अन्य देश से अधिक मजबूत दावा है। मुइज्जू ने 2022 में मालदीव की पिछली सरकार द्वारा मॉरीशस की संप्रभुता को दी गई मान्यता को औपचारिक रूप से वापस ले लिया। उन्होंने इस फैसले को मालदीव के समुद्री हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया। इसके साथ ही, मालदीव सरकार ने यूनाइटेड किंगडम की उस योजना का विरोध करते हुए औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई, जिसके तहत ब्रिटेन चागोस द्वीपसमूह का नियंत्रण मॉरीशस को हस्तांतरित करने वाला है।
चागोस द्वीप समूह का पूरा मामला क्या है?
चागोस द्वीप समूह का विवाद आधुनिक इतिहास के सबसे जटिल भू-राजनीतिक और मानवाधिकार के मुद्दों में से एक है। यह केवल दो देशों के बीच जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि इसमें हिंद महासागर की रणनीतिक सुरक्षा, महाशक्तियों का प्रभाव और हजारों मूल निवासियों का विस्थापन शामिल है।
चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के मध्य में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का एक समूह है। यह मॉरीशस से लगभग 2,200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और मालदीव के दक्षिण में स्थित है। इसका सबसे बड़ा द्वीप डिएगो गार्सिया है। अपनी लोकेशन के कारण, यहां से मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका पर सैन्य नजर रखना और ऑपरेशन चलाना बेहद आसान है।
1965 का बंटवारा
मॉरीशस और चागोस दोनों ही ब्रिटिश उपनिवेश थे। 1968 में मॉरीशस को आजादी मिलने वाली थी। लेकिन आजादी से तीन साल पहले, 1965 में, ब्रिटेन ने मॉरीशस से चागोस द्वीप समूह को अलग कर दिया और इसे एक नया नाम दिया: ब्रिटिश-हिंद महासागर क्षेत्र।
ब्रिटेन ने इसके एवज में मॉरीशस को मात्र 30 लाख पाउंड का मुआवजा दिया था। मॉरीशस का हमेशा से यह तर्क रहा है कि आजादी से पहले दबाव में यह समझौता कराया गया था, जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ था।
डिएगो गार्सिया और अमेरिकी सैन्य बेस
चागोस को मॉरीशस से अलग करने का मुख्य कारण अमेरिका था। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका को हिंद महासागर में एक सुरक्षित और रणनीतिक सैन्य अड्डे की जरूरत थी। ब्रिटेन ने 1966 में डिएगो गार्सिया द्वीप को 50 साल के पट्टे पर अमेरिका को दे दिया (जिसे बाद में बढ़ा दिया गया)। आज यह अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी सैन्य अड्डों में से एक है, जिसका इस्तेमाल इराक और अफगानिस्तान युद्धों में भी किया गया था।
मूल निवासियों का जबरन विस्थापन
सैन्य अड्डा बनाने के लिए अमेरिका की शर्त थी कि द्वीप पर कोई स्थानीय आबादी नहीं होनी चाहिए। इसके बाद, 1967 से 1973 के बीच ब्रिटेन ने चागोस के लगभग 1,500 से 2,000 मूल निवासियों को जबरन वहां से निकाल दिया और उन्हें मॉरीशस और सेशेल्स में निर्वासित कर दिया। इन लोगों को अपने घर लौटने से रोक दिया गया, जो एक बड़ी कानूनी और मानवाधिकार लड़ाई का कारण बना।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) और यूएन (UN) का फैसला
मॉरीशस ने दशकों तक अपनी संप्रभुता और चागोसियों की वापसी के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) ने एक ऐतिहासिक सलाहकारी राय में कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना गैर-कानूनी था और ब्रिटेन को जल्द से जल्द इस द्वीप को छोड़ देना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने भी भारी बहुमत से प्रस्ताव पारित कर ब्रिटेन से मॉरीशस को द्वीप सौंपने को कहा, लेकिन ब्रिटेन ने शुरू में इसे मानने से इनकार कर दिया।
हालिया ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता
दशकों के विवाद और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद, ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ (जिसका जिक्र आपके पिछले दस्तावेजों में भी था)। इस समझौते के तहत:
ब्रिटेन, चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने के लिए तैयार हो गया।
हालांकि, एक अहम शर्त के तहत डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य बेस एक लंबी अवधि (आमतौर पर 99 साल) के पट्टे के तहत काम करता रहेगा।
अब मालदीव का विवाद क्या है?
मालदीव और चागोस के बीच समुद्री सीमा (EEZ) का विवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण (ITLOS) ने पहले मॉरीशस के पक्ष में सीमांकन किया था। मालदीव ने पहले मॉरीशस के दावे का समर्थन किया था, लेकिन अब मालदीव सरकार ने अपना कूटनीतिक रुख बदल लिया है। मालदीव अब चागोस पर मॉरीशस की संप्रभुता और ब्रिटेन के साथ हुए समझौते पर आपत्ति जता रहा है, जिसके कारण मॉरीशस ने मालदीव से राजनयिक संबंध तोड़ लिए हैं।
