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    भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए 8-10% वार्षिक वृद्धि की आवश्यकता है: बैन एंड कंपनी

    AdminBy AdminApril 8, 2025No Comments12 Mins Read
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    भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए 8-10% वार्षिक वृद्धि की आवश्यकता है: बैन एंड कंपनी
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    नई दिल्ली

    देश के विकास की दिशा को ध्यान में रखते हुए, जी20 शेरपा और नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने बिना किसी संकोच के कहा: 2047 तक विकसित भारत बनने के लिए , भारत को 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से 30 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था में बदलना होगा। यह सिर्फ़ एक छलांग नहीं है – यह एक पीढ़ीगत धुरी है, और उन्होंने तर्क दिया कि फिनटेक क्षेत्र को इसे आगे बढ़ाने वाले इंजनों में से एक होना चाहिए।

    कांत ने कहा, "भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग नौ गुना वृद्धि होनी चाहिए, इसकी प्रति व्यक्ति आय में लगभग आठ गुना वृद्धि होनी चाहिए, और इसके विनिर्माण में लगभग 16 गुना वृद्धि होनी चाहिए।" उन्होंने व्यापक आर्थिक लक्ष्यों और क्षेत्र-विशिष्ट उत्प्रेरकों के बीच सीधी रेखा खींची। उनके लिए, फिनटेक केवल एक और उच्च-विकास वाला वर्टिकल नहीं है; यह समावेशी, व्यापक-आधारित विकास को प्राप्त करने का आधार है। "यह बहुत महत्वपूर्ण है कि फिनटेक क्षेत्र बढ़ता रहे और विस्तार करता रहे ताकि हम समाज में सभी स्तरों पर ऋण प्रदान करने में सक्षम हों।"

    आंकड़े उनके आत्मविश्वास को पुष्ट करते हैं। भारत अब वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा फिनटेक हब है, न केवल मात्रा के मामले में बल्कि मूल्य के मामले में भी। इस क्षेत्र ने 2023 में 25 बिलियन डॉलर का राजस्व दर्ज किया – जो कि साल-दर-साल (YoY) 56 प्रतिशत की शानदार वृद्धि है। 2030 के लिए अनुमान और भी चौंकाने वाले हैं: 150 फिनटेक यूनिकॉर्न जिनका संयुक्त मूल्यांकन 500 बिलियन डॉलर है और वार्षिक राजस्व 190 बिलियन डॉलर तक पहुँच रहा है।

    कांत इस विस्फोट का श्रेय तकनीक-प्रेमी युवा जनसांख्यिकी, पूंजी तक बेहतर पहुंच, सरकारी नीतियों को सक्षम बनाने और मोबाइल और इंटरनेट बुनियादी ढांचे में व्यापक प्रगति के शक्तिशाली मिश्रण को देते हैं। लेकिन उन्होंने एक चेतावनी भी जारी की- इस वृद्धि को जिम्मेदारी में बांधा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "नवाचार फिनटेक की जीवनरेखा है, और जब हम नवाचार करते हैं, तो हमें जिम्मेदारी से ऐसा करना चाहिए।" इसका मतलब है कि ऐसे उत्पाद डिजाइन करना जो कमजोर आबादी की सेवा करें, न कि उन्हें किनारे करें। इसका मतलब है साइबर सुरक्षा खतरों के प्रति लगातार सतर्क रहना और यह सुनिश्चित करना कि UPI, डिजिटल वॉलेट, ब्लॉकचेन के माध्यम से मुख्यधारा का अपनाना, केवल नवीनता पर नहीं, बल्कि भरोसे पर आधारित हो।

    स्व-नियमन केंद्रीय विषय था। राज्य द्वारा हर कदम तय करने की प्रतीक्षा करने के बजाय, कांत भारतीय रिजर्व बैंक के साथ मिलकर काम करने वाले स्व-नियामक संगठनों (एसआरओ) में फिनटेक शासन का भविष्य देखते हैं। "ये संस्थाएँ आरबीआई की निगरानी में काम करती हैं। वे उद्योग मानकों को निर्धारित करने, अनुपालन लागू करने और नियामकों और फिनटेक कंपनियों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।"

    वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल करने की राह की चुनौतियाँ:

        गरीबी और असमानता:
            वर्ष 1947 में स्वतंत्रता से लेकर वर्ष 1991 तक गरीबी कम करने के उद्देश्य से समाजवादी नीतियों के क्रियान्वयन के बावजूद भारत की गरीबी दर 50% के आसपास बनी रही।
            हालाँकि, उदारीकरण के बाद  (1991-2011) गरीबी लगभग 20% तक कम हो गई, जहाँ 350 मिलियन लोग गरीबी से बाहर आ गए।
        मध्यम-आय जाल:
            विश्व बैंक की परिभाषा के अनुसार, मध्यम-आय जाल (Middle-Income Trap) से तात्पर्य ऐसी स्थिति से है, जिसमें एक मध्यम-आय देश बढ़ती लागत और घटती प्रतिस्पर्द्धा के कारण उच्च-आय अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने में विफल रहता है।

            भारत के लिये भी मध्यम-आय जाल में फँसने का खतरा है, जहाँ देश मध्यम-आय से उच्च-आय की स्थिति में पहुँचने में विफल हो जाते हैं।
            वर्ष 1960 में 101 मध्यम-आय अर्थव्यवस्थाओं में से केवल 23 ही वर्ष 2018 तक उच्च-आय अर्थव्यवस्था बन सके।

            ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की जाती हैं कि विकसित अर्थव्यवस्था की राह पर आगे बढ़ते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था मध्यम-आय जाल में फँस सकती है। माना जाता है कि 5,000-6,000 अमेरिकी डॉलर प्रति व्यक्ति आय तक पहुँचने के बाद यह अधिक तेज़ी से आगे नहीं बढ़ पाएगी।
        वृद्ध होती आबादी:
            भारत की आबादी, जो वर्तमान में लगभग 1.4 बिलियन है, वर्ष 2048 तक 1.64 बिलियन के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचने के बाद बाद वर्ष 2100 तक घटकर 1.45 बिलियन रह जाएगी।

            इसके परिणामस्वरूप, भारत को वृद्ध होती आबादी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, जिसमें स्वास्थ्य देखभाल पर बढ़ते खर्च, बढ़ती पेंशन देनदारियाँ और संभावित श्रम की कमी शामिल हैं।

        गतिहीन कृषि:
            कृषि क्षेत्र भारत की लगभग 46% आबादी को रोज़गार प्रदान करता है और भारत के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगभग 16.5% है।

            हालाँकि, अप्रभावी भूमि सुधारों, अवैज्ञानिक अभ्यासों, संस्थागत ऋण प्रवाह की कमी और जलवायु अनिश्चितताओं के कारण यह गतिहीन एवं निम्न उत्पादक क्षेत्र बना हुआ है।

        विनिर्माण क्षेत्र का पिछड़ापन:
            आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र भारत के केवल 11.4% कार्यबल को रोज़गार प्रदान करता है।
            इसके अलावा, विनिर्माण क्षेत्र को उच्च इनपुट लागत और अस्थिर मांग के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

        अकुशल लॉजिस्टिक्स:
            आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 से पता चलता है कि भारत में लॉजिस्टिक्स लागत सकल घरेलू उत्पाद के 14-18% के बीच है, जो वैश्विक बेंचमार्क 8% से अधिक है। इसके साथ ही, लॉजिस्टिक प्रदर्शन सूचकांक (LPI) 2023 में भारत 38वें स्थान पर है।

        रोज़गारहीनता और प्रच्छन्न बेरोज़गारी:
            आईटी सेवाओं में उछाल से प्रेरित भारत के उच्च विकास वर्षों (2000-10) के बावजूद 46% श्रम शक्ति अभी भी कृषि में संलग्न है, जो सकल घरेलू उत्पाद में केवल 18% का योगदान देती है। इसकी उत्पादकता कम है और यह अल्प-रोज़गार (underemployment) की समस्या से भी ग्रस्त है।

            इसके अलावा, CMIE के अनुसार भारत में बेरोज़गारी दर मई 2024 में 7% से तेज़ी से बढ़कर जून 2024 में 9.2% हो गई।

        श्रम बल गतिशीलता:
            महिला श्रम बल भागीदारी मात्र 37% है, हालाँकि वर्ष 2019 में 26% की तुलना में इसमें सुधार हुआ है। फिर भी, यह स्तर अन्य तेज़ी से विकास करते देशों की तुलना में कम है।

        वैश्विक आर्थिक मंदी:
            वैश्विक आर्थिक मंदी, वस्तुओं की अस्थिर कीमतें, भू-राजनीतिक तनाव और कठिन होती वित्तीय स्थितियाँ निर्यात में कमी, आयात लागत में वृद्धि तथा विकास परियोजनाओं के लिये भर्ती एवं वित्तपोषण में कमी लाकर भारत के आर्थिक निवेश विकास में बाधा उत्पन्न कर रही हैं।

    सरकार द्वारा कौन-से प्रमुख कदम उठाए गए हैं?

        पूंजीगत व्यय में वृद्धि: पिछले वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 24 में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure- CAPEX) में 28.2% की वार्षिक वृद्धि हुई है, जहाँ अवसंरचना विकास और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

        ऋण विकास: अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा ऋण वितरण 20.2% की वृद्धि के साथ 164.3 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया, जो व्यय में वृद्धि को दर्शाता है। इसके अलावा, सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (GNPA) अनुपात सुधरकर 2.8% हो गया, जो 12 वर्ष का न्यूनतम स्तर है।
        अवसंरचनात्मक विकास:
            आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की गति वित्त वर्ष 2014 में 11.7 किमी प्रति दिन से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 तक 34 किमी प्रति दिन हो गई है।

                इसके अलावा, गति शक्ति योजना या मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी योजना के लिये राष्ट्रीय मास्टर प्लान को कार्यान्वित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिये अवसंरचनात्मक परियोजनाओं हेतु समन्वित योजना-निर्माण एवं निष्पादन सुनिश्चित करना है।

        राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (National Monetisation Pipeline- NMP): इसमें चार वर्ष की अवधि (वित्त वर्ष 2022 से 2025) में सड़क, रेलवे, बिजली, तेल एवं गैस पाइपलाइन, दूरसंचार, नागरिक उड्डयन जैसे क्षेत्रों में केंद्र सरकार की प्रमुख परिसंपत्तियों को पट्टे/लीज़ पर देने के माध्यम से 6 लाख करोड़ रुपए की कुल मुद्रीकरण क्षमता की परिकल्पना की गई है ।

        डिजिटल इंडिया पहल: इसका उद्देश्य डिजिटल अवसंरचना विकास के माध्यम से राष्ट्रीय सशक्तीकरण करना, जीवन स्तर को ऊपर उठाना और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है।

        राष्ट्रीय शिक्षा नीति और ‘स्किल इंडिया’ मिशन: सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने और देश की जनसांख्यिकी को कुशल बनाने के लिये इन पहलों को क्रियान्वित कर रही है।

        प्रत्यक्ष लाभ प्रदान करना: प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer- DBT) और जन धन योजना से राजकोषीय दक्षता बढ़ी और ‘लीकेज’ कम हुआ, जिससे लोगों की व्यय क्षमता में वृद्धि हुई।

        संवहनीयता और जलवायु प्रत्यास्थता को बढ़ावा देना: भारत ‘पंचामृत’ लक्ष्यों और सौर मिशन तथा राष्ट्रीय पवन-सौर हाइब्रिड नीति जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से संवहनीय आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रहा है।

    एक विकसित देश के रूप में भारत के लिये क्या चुनौतियाँ होंगी?

        आर्थिक भेद्यता:
            विकसित अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक वित्तीय प्रणालियों और बाज़ारों में अधिक एकीकृत होती हैं, जिससे वे अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।

                उदाहरण के लिये, विकसित देशों को वर्ष 2007-08 के सबप्राइम संकट और कोविड-19 मंदी के बाद अधिक आर्थिक आघातों का सामना करना पड़ा।

            जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा, उसे वैश्विक वित्तीय संकटों, व्यापार व्यवधानों और अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी मूल्यों में बदलाव का अधिक सामना करना पड़ेगा।

        जलवायु संवेदनशीलता में वृद्धि:

            भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में जलवायु संबंधी मुद्दों को संबोधित करने के लिये अत्यधिक दबाव का सामना करना पड़ेगा। इसमें अवसंरचना, कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का प्रबंधन करना शामिल है।

            अपनी विविध भौगोलिक स्थिति के कारण भारत अनेक प्रकार के जलवायु जोखिमों (जैसे गंभीर बाढ़, ग्रीष्म लहरें और चक्रवात शामिल) के प्रति संवेदनशील है, जो आर्थिक स्थिरता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।

        रोज़गार वृद्धि:
            विकसित अर्थव्यवस्थाओं मे ऑटोमेशन, उद्योग की बदलती आवश्यकताओं और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण कभी-कभी रोज़गार सृजन की गति आर्थिक वृद्धि से पीछे रह जाती है। भारत को औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के विस्तार के साथ-साथ गतिहीन रोज़गार सृजन की संभावना को संबोधित करने की आवश्यकता होगी।

            अर्थव्यवस्था में तीव्र तकनीकी प्रगति और संरचनात्मक परिवर्तनों के कारण कौशल असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जहाँ उपलब्ध रोज़गार कार्यबल के कौशल के अनुरूप नहीं होते हैं।
        वि-वैश्वीकरण:

            वि-वैश्वीकरण (Deglobalization) का तात्पर्य वैश्विक व्यापार और निवेश पर निर्भरता कम करने की प्रवृत्ति से है, जो प्रायः संरक्षणवाद और व्यापार बाधाओं में वृद्धि की विशेषता रखता है। इसका असर भारत के निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़ सकता है।

            वैश्विक व्यापार नीतियों में परिवर्तन और भू-राजनीतिक गतिशीलता में बदलाव अंतर्राष्ट्रीय निवेश तथा व्यापार संबंधों के लिये अनिश्चितताएँ पैदा कर सकते हैं।

    आगे की राह:

        औद्योगिक संकुलों का विकास: सरकार को व्यापक सहायता प्रणालियों के साथ औद्योगिक संकुलों (Industrial Clusters) का विकास कर अवसंरचनात्मक सुधार के अपने प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिये।

            संकुल या क्लस्टर आधारित मॉडल, जहाँ विशिष्ट क्षेत्रों में विनियमों में ढील दी जाती है, विनिर्माण के लिये अनुकूल वातावरण का निर्माण कर सकता है।

            इसके अतिरिक्त, सरकार को उच्च टैरिफ के अधिरोपण से बचना चाहिये, जिससे स्थानीय निर्माताओं के लिये अलाभ की स्थिति बन सकती है और निर्यात प्रतिस्पर्द्धा में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

        विकास की गति को बनाए रखना: वित्त वर्ष 2024 में भारत की वास्तविक जीडीपी में 8.2% की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की गई, जो चार में से तीन तिमाहियों में 8% से अधिक रही। विकसित अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल करने के लिये भारत को इस मज़बूत विकास प्रक्षेपवक्र को बनाए रखना होगा।

        मध्यम-आय जाल को संबोधित करना और विकास सुनिश्चित करना: भारत को मध्यम-आय जाल से बचने के लिये एक बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जो न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप के साथ निजी उद्यम का समर्थन करती हो। अर्थव्यवस्था का फोकस ‘कारोबार सुगमता’ (ease of doing business) को बढ़ाने और आर्थिक सुधारों को जारी रखने पर होना चाहिये।

            विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट 2024 के अनुसार नीतियों को ‘3i’ रणनीति की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, यानी मध्यम-आय जाल से बचने के लिये निवेश, प्रेरणा और नवाचार (Investment, Infusion, and Innovation)।

            दक्षिण कोरिया 3i रणनीति के सभी तीन चरणों से गुज़रने और इस विकास पथ पर आगे बढ़ने के मामले में एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

     

     

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