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    मध्यप्रदेश

    भोपाल गैस कांड के 40 साल बाद जहरीले कचरे की शिफ्टिंग हुई शुरू, जानिए कहां लगाया जाएगा ठिकाने

    AdminBy AdminDecember 30, 2024No Comments11 Mins Read
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    भोपाल गैस कांड के 40 साल बाद जहरीले कचरे की शिफ्टिंग हुई शुरू, जानिए कहां लगाया जाएगा ठिकाने
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    भोपाल

     भोपाल गैस त्रासदी के 40 साल बाद जहरीले कचरे को हटाने की तैयारी शुरू कर दी गई है. गैस त्रासदी के करीब 40 साल बाद यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से 337 टन जहरीला कचरा हटाया जा रहा है. यह कचरा राजधानी भोपाल से पीथमपुर में ले जाकर जलाया जाएगा. कचरे को ले जाने के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाएगा. सभी कचरे को 12 हैडार्डस वेस्ट कंटेनर से पीथमपुर ले जाया जाएगा.

    दरअसल, कोर्ट में सुनवाई के बाद आए निर्णय के बाद से यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से कचरा हटाने की तैयारी की जा रही थी. इसको लेकर बीच में विवाद की भी स्थिति बनी हुई थी. लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बाद इसे निस्तारण के लिए पीथमपुर ले जाने की तैयारी पूरी हो गई है. इस बीच आज से पुलिस की निगरानी में यह कार्य शुरू हो गया. यह पूरा कचरा पीथमपुर की एक औद्योगिक अपशिष्ट निपटान इकाई में नष्ट किया जाएगा.

    मध्य प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट की फटकार के बाद ये एक्शन लिया है. एक सप्ताह पहले ही MP हाईकोर्ट ने सरकार को फटकार लगाई थी. कोर्ट ने भोपाल में फैक्ट्री साइट से कचरा न हटाए जाने पर सवाल उठाए थे. अदालत ने सरकार से पूछा था कि लगातार निर्देश दिए जाने के बाद भी कचरे का निपटारा क्यों नहीं किया जा रहा है? जबकि इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ हाई कोर्ट भी निर्देश जारी कर चुका है. सुनवाई के दौरान HC ने कहा था कि 'निष्क्रियता की स्थिति' एक और त्रासदी का कारण बन सकती है.

    सुबह-सुबह फैक्ट्री पहुंचे GPS से लैस ट्रक

    जहरीले कचरे को इंदौर ले जाने के लिए रविवार सुबह GPS से लैस आधा दर्जन ट्रक यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री साइट पर पहुंचे. इनके साथ लीक प्रूफ कंटेनर भी थे. मौके पर PPE किट पहने कर्मचारी, भोपाल नगर निगम के कर्मचारी, पर्वायरण एजेंसियों के लोग, डॉक्टर्स और कचरा डिस्पोज करने वाले विशेषज्ञ भी शामिल थे. फैक्ट्री के आसपास पुलिकर्मियों की तैनाती भी की गई थी. एजेंसी के सूत्रों के मुताबिक प्लान के तहत जहरीले कचरे को इंदौर के पीथमपुरा में जलाया जाएगा. यह इलाका राजधानी भोपाल से करीब 250 किलोमीटर दूर है.  

    बनाया जा रहा 250 KM लंबा कॉरिडोर

    मध्य प्रदेश के गैस राहत एवं पुनर्वास विभाग के डायरेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह का के मुताबिक पीथमपुरा तक जहरीला कचरा पहुंचाने के लिए 250 किलोमीटर का ग्रीन कॉरिडोर बनाया जा रहा है. हालांकि, उन्होंने कचरे के परिवहन और उसे डिस्पोज करने की तारीख नहीं बताई. लेकिन सूत्रों का कहना है कि 3 जनवरी तक कचरा पीथमपुरा पहुंच जाएगा.

    3 महीने में जलकर राख हो जाएगा कचरा!

    डायरेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह ने एजेंसी को बताया कि शुरुआत में कचरे का कुछ हिस्सा पीथमपुर की कचरा निपटान इकाई में जलाया जाएगा और अवशेष (राख) की वैज्ञानिक जांच कर पता लगाया जाएगा कि उसमें कोई हानिकारक तत्व तो नहीं बचा है. डायरेक्टर ने कहा,'अगर सब कुछ ठीक रहा तो 3 महीने में कचरा जलकर राख हो जाएगा. लेकिन अगर जलने की गति धीमी रही तो इसमें 9 महीने तक लग सकते हैं. कचरा जलाने वाली 'भट्टी' से निकलने वाले धुएं को 4 लेयर फिल्टर्स से गुजारा जाएगा ताकि आसपास की हवा प्रदूषित न हो. इस प्रोसेस का हर पल रिकार्ड रखा जाएगा.'

    डबल लेयर के अंदर किया जाएगा डिस्पोज

    स्वतंत्र कुमार सिंह के मुताबिक,'एक बार जब कचरे को जला दिया जाएगा और हानिकारक तत्वों से मुक्त कर दिया जाएगा तो राख को दो-परत वाली मजबूत 'झिल्ली' से ढक दिया जाएगा और 'लैंडफिल' में दफना दिया जाएगा. ऐसा इसलिए किया जाएगा कि ताकि सुनिश्चित हो सके कि कचरा किसी भी तरह से मिट्टी और पानी के संपर्क में नहीं आएगा.'

    पीथमपुरा के आसपास के लोग कर रहे विरोध

    हालांकि, इस पूरी प्रोसेस का एक दूसरा पहलू भी है. पीथमपुरा के आसपास के लोग और सामाजिक कार्यकर्ताओं का समूह वहां कचरा जलाने का विरोध कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि 2015 में पीथमपुर में परीक्षण के तौर पर 10 टन यूनियन कार्बाइड का कचरा नष्ट किया गया था. इससे कारण आसपास के गांवों की मिट्टी, जमीन का पानी और पानी के सोर्स प्रदूषित हो गए. हालांकि, स्वतंत्र कुमार सिंह ने इस दावे को खारिज कर दिया.

    हाई कोर्ट ने सरकार को लगाई थी फटकार

    बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 3 दिसंबर को 4 सप्ताह के अंदर जहरीले कचरे को फैक्ट्री से शिफ्ट करने की डेडलाइन दी थी. हाई कोर्ट ने कहा था कि यह खेदजनक स्थिति है. अदालत ने सरकार को चेतावनी दी थी कि अगर निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो अदालत की अवमानना के तहत कार्रवाई की जाएगी. हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एसके कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजनल बैंच ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था,'हम समझ नहीं पा रहे हैं कि समय-समय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद भी जहरीले कचरे को हटाने का काम शुरू क्यों नहीं हुआ है, जबकि कचरा हटाने के लिए 23 मार्च 2024 की योजना पर काम किया जाना था.' इस मुद्दे को लेकर अब 6 जनवरी को हाई कोर्ट में अगली सुनवाई होगी.

    पांच हजार से ज्यादा लोंगों की हुई थी मौत

    बता दें कि 2 दिसंबर 1984 की रात भोपाल की यूनियन कार्बाइड कीटनाशक फैक्ट्री से जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनाइट (MIC) का रिसाव हुआ था. इस हादसे में 5,479 लोगों की मौत हो गई थी. गैस लीक की वजह से पांच लाख से ज्यादा लोगों का स्वास्थ्य बुरी तरह से प्रभावित हुआ था. जिसका असर आज भी कई लोगों पर नजर आता है. इस हादसे के बाद कई लोग विकलांगता के शिकार हो गए थे.

    कचरा निपटारा मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?

    2004 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई. कोर्ट ने भारत सरकार के रसायन और पेट्रोकेमिकल्स विभाग के सचिव की अध्यक्षता में एक टास्क फोर्स का गठन किया. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के विशेषज्ञों ने 2005 में कचरे के सुरक्षित निपटान के लिए गुजरात के अंकलेश्वर में भरूच एनवायरो-इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (बीईआईएल) के स्वामित्व वाले एक विश्व स्तरीय भस्मक की पहचान की गई. लेकिन 2007 में गुजरात में विरोध प्रदर्शन और 2009 में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, इसे रोक दिया गया.

    टास्क फोर्स ने हैदराबाद में डुंगीगल और मुंबई में तलोजा सहित अन्य उपचार, भंडारण और निपटान सुविधा (टीएसडीएफ) साइटों की पहचान की. 2010 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक सफल परीक्षण के बाद मध्य प्रदेश के पीथमपुर में टीएसडीएफ में 346MT कचरे को जलाने की अनुमति दी. इस फैसले को दो साल बाद राज्य ने चुनौती दी और 2012 में सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका दायर की जिसमें तर्क दिया गया कि “भोपाल गैस के जहरीले कचरे को जलाने के लिए यह सुविधा तकनीकी रूप से उपयुक्त नहीं है, जो औद्योगिक कचरे की तुलना में अधिक खतरनाक है.”

    डॉयचे गेसेलशाफ्ट फर इंटरनेशनेल ज़ुसामेनरबीट जीएमबीएच (जीआईजेड), जिसने जर्मनी में कचरे के निपटान के लिए 24.56 करोड़ रुपये की लागत का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, लेकिन 2012 में अपने नागरिकों के व्यापक विरोध के बाद इसे वापस ले लिया. 2015 में, केंद्र ने पीथमपुर टीएसडीएफ में एक परीक्षण चलाया, लेकिन निवासियों के विरोध के बाद आगे की योजनाओं को स्थगित करना पड़ा. फिर केंद्र और राज्य की सहमति के बिना सात साल तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.
    जहरीले कचरे के निपटारे की क्या योजना है?

    इस परियोजना के 180 दिनों में क्रियान्वित होने की उम्मीद है. पहले 20 दिनों में, कचरे को पैक किए गए ड्रमों में दूषित स्थल से निपटान स्थल तक ले जाया जाएगा. बाद में, इस कचरे को भंडारण से एक मिश्रण शेड में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जहां इसे रीजेंट्स के साथ मिलाया जाता है और फिर 3 से 9 किलोग्राम वजन वाले छोटे बैग में पैक किया जाता है. वास्तविक भस्मीकरण 76वें दिन ही होगा जब भस्मीकरण से संबंधित सभी रिपोर्टें वास्तविक निपटान शुरू होने से पहले वारिस की मंजूरी के लिए कई विभागों को भेजी जाएंगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हवा की गुणवत्ता खराब न हो और मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुसार भस्मीकरण हो.

    राज्य के गैस राहत और पुनर्वास विभाग के निदेशक स्वतंत्र कुमार सिंह ने कहा, "भोपाल गैस त्रासदी का कचरा एक कलंक है जो 40 साल बाद मिटने जा रहा है. हम इसे सुरक्षित तौर पर पीथमपुर भेजकर नष्ट करेंगे. इस रासायनिक कचरे को भोपाल से पीथमपुर भेजने के लिए करीब 250 किलोमीटर लंबा ‘ग्रीन कॉरिडोर' बनाया जाएगा. ‘ग्रीन कॉरिडोर' का मतलब सड़क पर यातायात को व्यवस्थित करके कचरे को कम से कम समय में गंतव्य तक पहुंचाने से है."

    हालांकि इस कचरे को पीथमपुर भेजकर नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू किए जाने की कोई तारीख नहीं बताई गई है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उच्च न्यायालय के निर्देश के मद्देनजर ये प्रक्रिया जल्द शुरू हो सकती है.
    कई प्रक्रियाओं से होकर गुजरेगी कचरे का निपटारा

    गैस राहत और पुनर्वास विभाग के निदेशक ने बताया कि पीथमपुर की अपशिष्ट निपटान इकाई में शुरुआत में कचरे के कुछ हिस्से को जलाकर देखा जाएगा और इसके ठोस अवशेष (राख) की वैज्ञानिक जांच की जाएगी, ताकि पता चल सके कि इसमें कोई हानिकारक तत्व बचा तो नहीं रह गया है. अगर जांच में सब कुछ ठीक पाया जाता है, तो कचरे को तीन महीने के भीतर जलाकर भस्म कर दिया जाएगा. वरना इसे जलाने की रफ्तार धीमी की जाएगी, जिससे इसे नष्ट होने में नौ महीने तक लग सकते हैं.

    स्वतंत्र कुमार सिंह ने बताया कि भस्मक में कचरे के जलने से निकलने वाले धुएं को चार स्तरों वाले विशेष फिल्टर से गुजारा जाएगा, ताकि आस-पास की वायु प्रदूषित न हो और इस प्रक्रिया के पल-पल का रिकॉर्ड रखा जाएगा. कचरे के भस्म होने और हानिकारक तत्वों से मुक्त होने के बाद इसके ठोस अवशेष (राख) को दो परतों वाली मजबूत ‘मेम्ब्रेन' (झिल्ली) से ढककर ‘लैंडफिल साइट' में दफनाया जाएगा, ताकि ये अपशिष्ट किसी भी तरह मिट्टी और पानी के संपर्क में न आ सके. उन्होंने कहा कि कचरे को प्रदेश सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निगरानी में विशेषज्ञों का दल सुरक्षित तरीके से नष्ट करेगा और इसकी विस्तृत रिपोर्ट उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी.

    स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के एक तबके का दावा है कि ‘यूनियन कार्बाइड' के 10 टन कचरे को 2015 में पीथमपुर की अपशिष्ट निपटान इकाई में परीक्षण के तौर पर नष्ट किए जाने के बाद आस-पास के गांवों की मिट्टी, भूमिगत जल और जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं.

    गैस राहत और पुनर्वास विभाग के निदेशक सिंह ने इस दावे को गलत बताते हुए कहा, "2015 के इस परीक्षण की रिपोर्ट और सारी आपत्तियों की जांच के बाद ही पीथमपुर की अपशिष्ट निपटान इकाई में ‘यूनियन कार्बाइड' के कारखाने के 337 टन कचरे को नष्ट करने का फैसला किया गया है. इस इकाई में कचरे को सुरक्षित तरीके से नष्ट करने के सारे इंतजाम हैं और चिंता की कोई भी बात नहीं है."
    रासायनिक कचरे के निपटारे से पीथमपुर के लोग चिंतित

    बहरहाल, करीब 1.75 लाख की आबादी वाले पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा जलाने की योजना को लेकर आम लोगों की चिंताएं अब तक दूर नहीं हुई हैं. इस कचरे के पीथमपुर की अपशिष्ट निपटान इकाई में जल्द पहुंचने की खबरों के बीच रविवार को बड़ी तादाद में जुटे लोगों ने अपने हाथ पर काली पट्टी बांधी और रैली निकालकर विरोध जताया.

    रैली में शामिल लोगों ने अपने हाथों में 'पीथमपुर को भोपाल नहीं बनने देंगे' और 'पीथमपुर बचाओ, जहरीला कचरा हटाओ' जैसे नारों वाली तख्तियां थाम रखी थीं. प्रदर्शनकारियों ने कहा, "हम चाहते हैं कि यूनियन कार्बाइड कारखाने का कचरा नष्ट किए जाने से पहले वैज्ञानिकों द्वारा पीथमपुर की आबो-हवा की फिर से जांच की जाए. हम अदालत में भी अपना पक्ष रखने की पूरी कोशिश करेंगे."

    पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-बड़ी 1,250 इकाइयां

    इंदौर के पड़ोस के धार जिले के पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र में छोटी-बड़ी 1,250 इकाइयां हैं. पीथमपुर औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष गौतम कोठारी ने कहा, "हम यूनियन कार्बाइड कारखाने के कचरे को पीथमपुर की औद्योगिक अपशिष्ट निपटान इकाई में जलाने के लिए किए गए इंतजामों से संतुष्ट हैं. इस कचरे के निपटान को कोरी आशंकाओं के आधार पर हौवा नहीं बनाया जाना चाहिए और स्थानीय लोगों को डरना नहीं चाहिए." उन्होंने हालांकि कहा कि अगर इस कचरे को नष्ट किए जाने के दौरान पीथमपुर में कोई दुर्घटना होती है, तो उनका संगठन आंदोलन करेगा.

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